शराब का रुवाब

शराब का रुवाब

हमारे समाज में शराब का बहुत ही रुवाब है। यह सभी खुशी गमी वाले प्रयोजनों में देखी जाती है। या यों कहा जाए कि इसके बिना वर्तमान समाज का कोई भी काम पूरा नहीं होता, तो ग़लत नहीं होगा। वैसे तो इसका रुवाब पहले ही काफी था लेकिन कोराना काल में हुए लाकडाउन के बाद इसके रुवाब में बेतहाशा बढ़ोतरी हुई। कोरोना काल के लाकडाउन में जब हर चीज बंद थी, तो खुलने वालों में देवालय और शिक्षालय से पहले मदिरालय थे। हमारी सरकार को लोगों के भोजन और शिक्षा से पहले मदिरालय की चिंता हुई । और हो भी क्यों न क्योंकि इसे हमारे देश की सरकारों ने आय का जरिया समझ रखा है। देश में इसके रुवाब की स्थिति का पता इस बात से लगा सकते हैं कि सबसे पहले देश में अनलाक होने वाला स्थान मदिरालय ही थे , और इसमें बिकने वाली चीज थी शराब। हो सकता है कि भविष्य में इस प्राथमिकता पर प्रतियोगी परीक्षाओं में प्रश्न भी पूंछा जाए कि लाकडाउन में सबसे पहले अनलाक होने वाली स्थान/ चीज क्या थी? यदि ऐसा हुआ तो इसका रुवाब सातवें आसमान पर होगा।

शराब एक ऐसा पदार्थ है जिसकी समाज में चर्चा हर गली, चौराहे और चाय की दुकान पर होती है। इसकी चर्चा पीने और न पीने वाले दोनों खूब करते हैं। इसका इतिहास हजारों वर्ष पुराना है। इसे पीने पर इसमें उपलब्ध अल्कोहल की मात्रा मस्तिष्क और तंत्रिका तंत्र को सुस्त कर देती है जिससे पीने वाले को ऐसा लगता है कि इससे मजा और आराम मिलता है। इसका नाम लेते ही समाज का एक बड़ा तबका जहां नाक भौंहें सिकोड़ लेता है वहीं दूसरी ओर पीने वाला व्यक्ति ओठों पर जीभ फेरने लगता है।

1980 के दशक में जूनियर हाईस्कूल में एक विषय पढ़ाया जाता था “नैतिक शिक्षा”, इसमें एक पाठ होता था – नशा ले डूबा, जिसमें कहानी का नायक शराब पीने वाला होता है। शराब पी पीकर घर को बदहाली की कगार पर खड़ा कर देता है। घर में पैसे की भारी किल्लत रहती है। एक दिन उसका बेटा बीमार होता है। उसकी पत्नी जैसे तैसे कुछ बचाए हुए पैसों का इंतजाम करती है और अपनी पति को दवा लाने के लिए कहती है। स्वयं बच्चे की देखभाल करने लगती है। उसका पति दवा लाने के लिए जाता है और रास्ते में पड़ने वाली शराब की दुकान पर जाकर दवा के पैसों से शराब पी लेता है। इधर पत्नी दवा का इंतजार करती रहती है और पति शराब पीकर मदहोश होकर नाली के पास गिर जाता है। जब उसका नशा उतरता है तो वह घर की ओर चल पड़ता है। जब घर पहुंचता है तो देखता है कि उसकी पत्नी बेटे का सिर गोद में रखकर रो रही है। उसे पता चलता है कि उसका बच्चा अब इस दुनिया में नहीं रहा। वह जोर जोर से रोता है और फिर कभी शराब न पीने की सौगंध खाता है। यह केवल एक कहानी नहीं, हमारे समाज की हकीकत है।

मानव समाज में हमेशा से शराब को अभिशाप तथा शराब पीने वालों को हिकारत तथा घृणा की दृष्टि से देखा जाता रहा है। सभी अपराधों की जड़ में शराब के बीज देखे जा सकते हैं। हर गलत काम की जननी शराब है। हर वह काम जो मानवता तथा नैतिक मूल्यों के खिलाफ है, शराब से शुरू होता है। आज समाज में अपराध का जो ग्राफ बढ़ रहा है उसके पीछे शराब एक प्रमुख कारक है। यह देखा गया है कि ज्यादातर सड़क दुर्घटनाएं भी शराब पीकर वाहन चलाने से हो रही हैं। हत्या, चोरी, डकैती, बलात्कार जैसी अमानवीय घटनाओं के मूल में शराब ही है। यह घटनाएं या तो शराब पीकर हो रही हैं या तो शराब को खरीदने के लिए पैसों के जुगाड़ के लिए हो रही हैं।

शराब शब्द की दुश्चरित्रता उसके शव्द विन्यास से साफ झलकती है। शराब शब्द सड़ाव का सुधरा हुआ रूप है। जिसका अर्थ है सड़ा हुआ पानी। आज भी देश के कुछ इलाकों में महुआ तथा कुछ अन्य चीजों को पानी में सडा़कर शराब निकाली जाती है। कहीं कहीं पर खराब फलों या उनके छिलकों को भी सड़ाकर शराब बनायी जाती है। जिस तरह से नाम बदल देने से कोई पदार्थ अपना गुण, धर्म नहीं बदल देता वैसे ही सड़ाव का नाम बदलकर शराब हो जाने से भी वह अपने अतीत को नही बदल पा रहा है। शराब शब्द दों शब्दों से मिलकर बना है शर तथा आब। जिसका अर्थ होता है तीर की तरह पानी। यानी कि ऐसा पानी जिसको पीने से वह तीर की गति से अपना काम करता हो। शराब को पीने वाले चाहे सुरा कह लें, मदिरा कह लें या वाइन कह लें, या पीने के लाख बहाने कर लें, शराब के काले अतीत को नहीं बदला जा सकता।

दुनिया के हर देश में, हर धर्म में शराब पीना वर्जित है। हिन्दू धर्म में भी मदिरा, मांस को तामसी और त्याज्य कहा गया है। कारण एक ही है कि शराब पीने के बाद शराबी अपने ऊपर से नियन्त्रण खो देता है, उसके पास सही गलत का निर्णय करने की क्षमता समाप्त हो जाती है। 30 से 40 मिलीग्राम शराब पीने के बाद मस्तिष्क के वे केन्द्र अपना काम करना बंद कर देते हैं जो कि शरीर के बिभिन्न कार्यों पर नियन्त्रण रखते हैं। यह अवरोधक केन्द्र मनुष्य को गलत काम करने से पहले रोकते हैं। वैज्ञानिक दृष्टिकोण से हम देखें तो हमारे शरीर मे 4 मिलीग्राम अल्कोहल की मात्रा हमेशा रहती है। यदि हम किसी भी रूप में और अल्कोहल अपने शरीर के अन्दर लेते हैं तो हमारा शरीर उसे उल्टी, पेशाब या पाखाने के रास्ते से बाहर निकालने का प्रयास करता है क्योंकि अल्कोहल मानव शरीर के लिए विजातीय पदार्थ है। शराब पीने के बाद अल्कोहल का कुछ भाग आहार नली द्वारा सोख लिया जाता है और कुछ देर बाद यह रक्त में मिल जाता है। दो बार से ज्यादा शराब पीने वाले लोगों के हृदय का बेन्ट्रीकुलर मास बढ़ जाता है। इससे शराबी व्यक्ति के हृदय की गति बढ़ जाती है। चार कदम पैदल चलने से सांस धौंकनी की तरह चलने लगती है।

शराब पीने से व्यक्ति के अन्दर स्वेत रक्त कणिकाओं की संख्या कम होने लगती है जिससे तरह तरह की बीमारियॉ घेरने लगती है। शराब पीने के बाद शराबी मदमस्त हो जाता है। वह हाथी की तरह झूमता हुआ चलता है। लोगों को गालियॉं देता है। अपने को सबसे बड़ा समझने लगता है। यहां तक देखा गया है कि शराबी अपने मॉं बाप को भी गालियॉं बकने लगते हैं। सरेराह लोगों के सामने पेशाब करने लगते हैं। कभी कभी शराबी नशे की हालत में कुछ ऐसा कर बैठते हैं जिससे नशा उतरने के बाद जीवन भर उन्हें पछताना पड़ता है, क्योंकि समाज में एक बार छवि खराब होने के बाद उस छवि को कभी वापस नहीं लाया जा सकता।

लोग शराब शौकिया तौर पर पीना शुरू करते हैं। कुछ लोग तो आधुनिक बनने की चाह में अपनी प्रतिष्ठा को बढ़ाने के लिए शराब पीना शुरू करते हैं। पहले वे आधा पैग पीते है। फिर नशा न होने पर कुछ दिन बाद एक पैग पीने लगते हैं। यह एक पैग बढ़ते बढ़ते कब एक बोतल में बदल जाता है , पता ही नहीं चलता। यह एक तामसी पदार्थ है। यह हमारी इन्द्रियों को मांस को खाने के लिए प्रेरित करता है। यह कटु सत्य है कि जिस तरह का हमारा आहार होगा उसी तरह के विचार हमारे अन्दर पैदा होंगें। जिस तरह के विचार होंगे उसी तरह व्यवहार होगा। शराब पीने के साथ साथ लोग बीड़ी या सिगरेट भी पीना शुरू कर देते हैं। धीरे धीरे खर्च बढ़ना शुरू हो जाता है, आय कम होने लगती है क्योंकि शराब पीने वाला व्यक्ति नियमित तौर पर काम पर नहीं जा पाता। वह जहॉं पर काम करता है उसका मालिक गैरहाजिर होने के कारण वेतन में कटौती करने लगता है। यहीं से पारिवारिक कलह का जन्म होता है।

पूरा परिवार अप्रत्यक्ष रूप से इसका शिकार बनने लगता है। इस बुरी आदत के कारण मित्र भी साथ छोड़ देते हैं। मौका पड़ने पर कोई भी उधार देने के लिए तैयार नहीं होता है। अन्त में शराबी व्यक्ति अकेला पड़ जाता है। इस अकेलेपन को दूर करने के लिए वह और ज्यादा मात्रा में शराब पीने लगता है। ज्यादा शराब पीने की लत के कारण और पास में पैसा न होने के कारण धीरे धीरे घर का सामान बिकने लगता है। कुछ समय बाद खेत खलिहान और घर की औरतों के जेवरात शराब की भेंट चढ़ जाते हैं। शराबी व्यक्ति के पास असामाजिक काम करने के अलावा कोई रास्ता नहीं बचता। असामाजिक कार्य करने का परिणाम जेल ही होती है।

हम सबने अपने आसपास शराब के चक्कर में उजड़ते हुए घर देखे होंगे। एक हंसते खेलते परिवार को आत्महत्या करते देखा होगा। एक बेबस मॉ को अपने बच्चों के साथ कुएं में कूदकर या जहर खाकर मौत को गले लगाते देखा या सुना होगा, आखिर क्यों ? शराब पीने वालों के कारण सबसे बड़ी त्रासदी औरत को उठानी पड़ती है। शराबी शराब पीकर जब देर रात तक घर नहीं आता तो उसका इन्तजार करने वाली उसकी पत्नी ही होती है जो भूखे रहकर उसकी प्रतीक्षा करती रहती है। दरवाजा खोलने में यदि तनिक देर हो गयी तो शराबी पति की पिटाई खाने वाली पत्नी ही होती है। शादी लायक यदि शराबी की बहन या बेटी हुई तो उनकी शादी करने की चिन्ता में तिल तिल कर जलती एक औरत ही होती है। शराबी के बेबस छोटे बच्चों की भूख तथा बीमार बच्चों की दवा की चिन्ता तथा भोजन के लिए लोगों के सामने हाथ फैलाने वाली एक औरत ही होती है। अपने बच्चों के पालन पोषण के लिए लोगों के घरों में चौका बरतन करने वाली एक बेबस तथा लाचार औरत ही होती है। शराबी जब शराब पीकर उल्टी या पाखाना कर देता है तो उस गन्दगी को साफ करने वाली या तो शराबी की पत्नी या मॉं एक औरत ही होती है। न जाने ऐसे कितने शराबियों की बहन बेटियॉं शादी के बिना अपनी जिन्दगी गुजारने के लिए मजबूर हो जाती है। उनके सामने अपनी मॉं तथा भाई बहनों की बेबस जिन्दगी होती है। वे अपने बारे में सोच ही नही पातीं। पूरी जिन्दगी अपनों की परवरिश में गुजार देती हैं।

हम आये दिन समाचार पत्रों या टेलीविजन चैनलों पर यह समाचार पढ़ते या देखते हैं कि जहरीली शराब पीने से 15 लोगों की मौत, 20 की हालत गम्भीर। आखिर ऐसा क्यों ? इसका मूल कारण गरीबी तथा अशिक्षा तथा कुछ लोगों द्वारा कम खर्च में ज्यादा पैसे कमाने की कुचेष्टा है। शराबी तो जहरीली शराब पीकर तड़पकर दम तोड़ देता है और पीछे छोड़ देता है एक रोता बिलखता बेबस असहाय परिवार। जिनके पास जीवन यापन के लिए दूसरे के घर में चौका बरतन तथा मजदूरी जैसे काम के अलावा कोई जरिया नहीं बचता। एक गलत आदत वाला आदमी पूरे परिवार की भाग्य रेखा को बदल देता है। ऐसे परिवार को शून्य से सुधरने में एक दो पीढ़ी भी कम पड़ जाती है।

हमारे समाज तथा सरकारों को शराब पीने वालों का आखिरी हश्र पता है , फिर भी ज्यादा राजस्व कमाने के चक्कर में गली, चौराहों, सड़कों तथा राष्ट्रीय राजमार्गों पर शराब के ठेके खुलते जा रहे हैं। अभी हाल ही में उत्तर प्रदेश सरकार ने निर्णय लिया है कि उत्तर प्रदेश में अब हवाई अड्डों, मेट्रो और रेलवे स्टेशनों पर भी शराब बिकेगी। सरकार में बैठे लोगों को यह पता है कि आसानी से उपलब्धता होने पर ज्यादा से ज्यादा लोग शराब पियेंगे। आखिर जब लोग ही नहीं होंगे तो शराब की बिक्री से मिलने वाले राजस्व से बनाये गये स्कूलों, अस्पतालों, सड़कों तथा पुलों का क्या औचित्य है ? पूरे विश्व में वाहनों की कुल संख्या के केवल 1 प्रतिशत वाहन ही हमारे देश में हैं जबकि वाहन दुर्घटनाओं की संख्या 11 प्रतिशत है। इनमें से ज्यादातर दुर्घटनाएं शराब पीकर वाहन चलाने से हो रही हैं। इन समस्याओं से छुटकारा पाने के लिए सरकारों का यह नैतिक दायित्व है की शराब के इन ठेको कों बन्द करवाया जाय तथा शराब पीने वाले लोगों को इसके दुष्परिणाम बताकर हतोत्साहित किया जाय।

जीवन में हर रोज सुख या दुख आते रहते हैं। काम करने के बाद हर आदमी को थकान लगती है लेकिन थकान उतारने या सुख दुख मिटाने का बहाना शराब नहीं है। यह हमारे मन की कमजोरी है। शराब पीने वालों, आप एक बोतल शराब पीने की बजाय एक गिलास दूध पीकर तो देखिए क्या मजा आता है। आप शराब तथा इसकी सहयोगी चीजों को खाने पीने में जो पैसा बरबाद कर रहे हैं, जरा एक दिन अपने बच्चे के लिए इसी पैसे से एक चाकलेट खरीद कर लाकर देखिए। जो बच्चा आपकी आने की आहट से दरवाजा बन्द कर लेता है आपका वही बच्चा दूसरे दिन से आपकी राह देखेगा। शराब की बुरी लत के कारण राज रियासतों को समाप्त होते देखा गया है। यदि आपके पास कुबेर के पैसों के भन्डार क्यों न हों शराब पीना शुरू कर दीजिए अपने आप खाली हो जायेंगे। नशा ऐसी चीज है जिससे मनुष्य का तन, मन और धन तीनों बरबाद हो जाता है।

सरकार को चाहिए कि शराब जैसी विघटनकारी चीज को बढ़ावा न दे, इसे अपनी आय का जरिया न बनाए। शासन में बैठे जो परामर्शदाता लोग सरकारों को इसे आय का जरिया बताते हैं , वह केवल इसका एक पक्ष देखते हैं, इसका दूरगामी परिणाम क्या होगा? देश का भविष्य किस ओर जायेगा , वह यह नहीं सोचते। आखिरी ऐसी अनैतिक कमाई किस काम की, जिसमें किसी निरीह परिवार की आह लगी हो। क्या यही एक लोक कल्याणकारी राज्य की अवधारणा है कि अपनी कमाई के लिए अपनी ही जनता का घर उजाड़े ?, अपने ही नागरिकों को नशेड़ी बनाए ? अपनी ही महिलाओं और बच्चों को नशेड़ियों के हाथों पिटवाये ? हमारे देश में लोक कल्याणकारी राज्य की सर्वोत्तम अवधारणा राम राज्य है, और राम राज्य में ऐसे नशेड़ी समाज का कहीं भी उल्लेख नहीं है। लोक कल्याणकारी राज्य की अवधारणा में कोई न दरिद्र हो, न दुखी हो न दीन हो। और न कोई मूर्ख और शुभ लक्षणों से हीन हो –

नहिं दरिद्र कोउ दुःखी न दीना,
नहिं कोउ अबुध न लच्छन हीना।

– हरी राम यादव
7087815074

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