“देवी ब्रह्माणी” की उत्पत्ति गंगा की रेती में से हुई थी

 फोटो:- देवी ब्रह्माणी का मंदिर इनसेट में देवी मूर्ति
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– वेदव्रत गुप्ता
जसवंतनगर(इटावा)।वेदव्रत गुप्ता।इटावा जनपद के देवी  स्थलों की महिमा  जगविख्यात है। इनमे  कालका देवी लखना ,काली वाहन इटावा और ब्रह्माणी देवी जसवंत नगर शामिल हैं।
   
जसवंतनगर क्षेत्र के यमुना के बीहड़ों में विराजमान देवी  ब्रह्माणी मैया की महिमा और चमत्कारों की चर्चा  तो दूर-दूर तक फैली हुई है।इसी वजह हजारों भक्त वर्ष भर इन देवी के दर्शनो और झंडे, घंटे और प्रसादी  चढ़ाने मंदिर पर पंहुचते हैं।
     
बलरई रेलवे  स्टेशन से करीब 5 किलोमीटर दूर घने  बीहड़ों  में विराजमान देवी ब्रह्माणी के मंदिर का कोई अधिकृत इतिहास नहीं है । मंदिर में  विराजमान मूर्ति सैकड़ों वर्ष लगती है। मंदिर की स्थापना के बारे मे बुजुर्ग बताते हैं कि करीब 300 वर्ष पूर्व मध्य प्रांत के एक राजा गंगा स्नान व दर्शन करने फर्रुखाबाद गए हुए थे। रात में राजा जब गंगा किनारे अपने तंबू में   सो रहे थे तो तड़के सबेरे उन्हें स्वप्न आया कि  गंगा किनारे वह जहां  सो रहे हैं, वहां गंगा की रेती की खुदवाई कराएं, वहां तलाशने पर उन्हे देवी ब्रह्माणी मैया की मूर्ति मिलने को कहा गया। 
    सुबह जैसे ही राजा सो कर उठा, उसने अपने करिंदों से गंगा किनारे की रेती खुदवाई और स्वप्नानुसार ब्रह्माणी मैया की मूर्ति  राजा को प्राप्त हुई।स्वप्न में उन राजा से यह भी कहा गया था कि वह हाथी पर प्राप्त मूर्ति को लेकर अपने राज्य की सीमा की ओर चले और जहां भी हाथी बैठ जाए, वही इन देवी का मंदिर बनवा कर विराजित करवा दे।
     राजा ने ऐसा ही किया । गंगा स्नान करके वह हाथी पर विराजित कर देवी मैया को जब ला रहा था, तो जसवंत नगर पार करके जैसे ही यमुना के बीहड़ों  में जखन गांव के पास पहुंचा, उनका हाथी रुक कर बैठ गया। राजा ने फिर स्वप्न अनुसार वहीं पर देवी को विराजित कराया और बाद में यही देवी स्थान ब्रह्माणी देवी के मंदिर के रूप में विख्यात हुआ।
  इस300- 400 वर्ष पुराने मंदिर की ख्याति न केवल इटावा में है, बल्कि आसपास के जिलों, पूरे उत्तर प्रदेश, राजस्थान और मध्य प्रदेश में है। नवरात्रि के दिनों में भारी संख्या में श्रद्धालु यहां दर्शनों के लिए आते हैं और मनौतियां मांगते हैं ,जिनके पूरा हो जाने पर झंडा-घंटा और प्रसाद चढ़ाते हैं। चैत्र  और  शारदीय नवरात्रियों में ब्रह्माणी मंदिर पर विराट मेला लगता है  
इसके अलावा और आषाढ़ी यानि  गुरुपूर्णिमा पर भी मेले का आयोजन होता है, जिसमें हजारों झंडे और घंटे देवी पर चढ़ाये जाते है। हजारों की भीड़ और घंटे और झंडे चढ़ने से यमुना के जंगल में मंगल जैसा माहौल उत्पन्न हो जाता है।
 ब्रह्माणी का मंदिर यमुना के बीहड़ में मौजूद है। मगर जाखन शहर के अवशेष ही अब आसपास में शेष हैं। जाखन अब बीहड़ी क्षेत्र का  बड़ा गांव है। कालांतर में मंदिर खंडहर की स्थिति में पहुंच गया था। मगर सन 18सौ के आसपास भिंड ,मध्य प्रदेश के एक मुद्गल पंडित कमलापति ,जो जमीदार थे और प्रायः देवी दर्शन को  आते थे,उन्होंने देवी मंदिर का जीर्णोद्धार आरंभ कराया । फिर वहां स्वयं पुजारी हो गए। उनकी नौ पीढ़ियों से उनके परिवारी  ही मंदिर के पुजारी के रूप में हैं। इन पुजारी के वंशज मध्यप्रदेश के भिंड से आकर नगला तौर में बस गए थे।उन्होंने मंदिर की आमदनी और जीर्णोद्धार के लिए राजा भदावर से सहयोग लेकर काम कराया। बाउंड्री और कमरे आदि  बनवाए। बताते हैं की मंदिर से लगी लगभग 6 एकड़ जमीन भी है।बारी बारी से  एक एक साल सर्वकारी इसी पुजारी परिवार के सदस्यगण संभालते हैं। इन पुजारियों में मंदिर की सर्वकारी को लेकर आज भी विवाद चल रहा है।
बताते हैं कि भदावर स्टेट के राजा मानसिंह के लंबे समय तक जब कोई संतान नहीं जन्मी, तो उन्होंने देवी ब्रह्माणी की आराधना की। तब उन्हें राजा रिपुदमन सिंह पुत्र के रूप में देवी के वरदान से प्राप्त हुए। इसके बाद उनकी राजमाता शिरोमणि देवी ने संवत 2012 में मंदिर का जीर्णोद्धार करवाया।  ब्रह्माणी  मंदिर पुराने राजे रजवाड़ों के लिए आराध्य स्थल रहा है।राजा मानसिंह राजा नरसिंह राव, राजा मलाजनी, राजा प्रताप नेर जूदेव के वंशज यहां मनौती मनाने और अपने अस्त्र शस्त्र पूजने के लिए प्रायः आते थे।
कई बार प्रदेश के मुख्यमंत्री और बाद में देश के रक्षा मंत्री बने मुलायम सिंह यादव देवी ब्राह्मणी के परम भक्त थे ।वह हर चुनाव लड़ने से पूर्व देवी के दर्शनों  को आते थे और जब वह और उनके पुत्र अखिलेश यादव तथा भाई शिवपाल सिंह यादव सत्ता में आए, तो उन्होंने देवी ब्राह्मणी तक जाने के लिए हॉट मिक्स सड़क  बलरई से देवी मंदिर तक बनवाआई, साथ ही मंदिर को पर्यटन स्थल घोषित करने का भी प्रयास किया 
 एक जमाने में ब्रह्माणी मैया का नाम दस्युओं और बागियों के कारण भी काफी चर्चित रहा । नवरात्रों में मंदिर पर झंडा चढ़ाने और देवी आराधना के लिए पूर्व बागी डाकू मानसिंह ,माधो सिंह, तहसीलदार सिंह, मोहर सिंह, मलखान सिंह ,फूलन देवी, छविराम अवश्य ही आते थे। पुलिस नाकेबंदी के बावजूद वह वेष बदलकर मैया के द्वार पर  माथा अवश्य टेक जाते थे। ब्रह्माणी का  बीहड़ सदैव से वैसे ही बागियों के लिए सबसे सुरक्षित शरण स्थली थी।*वेदव्रत गुप्ता
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